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नोएडा की फैक्ट्रियों में मजदूरों की बदहाली उजागर वेतन और शोषण की दर्दनाक कहानी

Satyakhabarindia

नोएडा और आसपास के खोड़ा, सेक्टर 55, ममूरा और सेक्टर 62–65 जैसे इलाकों में सुबह सात से आठ बजे का दृश्य एक जैसा होता है। सड़कों पर हजारों दिहाड़ी मजदूर काम की तलाश में खड़े दिखाई देते हैं। इनमें से कुछ को ही दिन का काम मिल पाता है, बाकी खाली हाथ लौट जाते हैं। इसी भीड़ के बीच ऑटो, साइकिल और पैदल चलते मजदूर फैक्ट्रियों की ओर निकलते हैं। महिलाएं और कम उम्र के युवा भी इसी भीड़ का हिस्सा हैं। दिन की शुरुआत उम्मीद से होती है, लेकिन कई बार यह उम्मीद शाम तक टूट जाती है।

10–12 घंटे काम और सीमित मजदूरी की सच्चाई

फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर सुबह जल्दी घर से निकलते हैं और रात आठ बजे तक लौटते हैं। कई जगहों पर 10 से 12 घंटे की ड्यूटी के बावजूद वेतन सिर्फ 10 से 12 हजार रुपये तक सीमित है। लंबे समय से काम करने के बावजूद इन्हें आज भी अकुशल मजदूर ही माना जाता है। न प्रमोशन होता है और न ही वेतन में नियमित बढ़ोतरी। कई मजदूर बताते हैं कि कोरोना के बाद से वेतन लगभग स्थिर है। महंगाई बढ़ने के बावजूद आय में कोई खास सुधार नहीं हुआ है, जिससे परिवार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

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लेबर कानून और सुविधाओं पर सवाल

कागजों में PF और ESIC जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। मजदूरों को न तो PF नंबर की जानकारी होती है और न ही उन्हें सैलरी स्लिप मिलती है। कई फैक्ट्रियों में ओवरटाइम और वेतन वृद्धि पर भी कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। श्रम विभाग और निरीक्षकों की मौजूदगी के बावजूद मजदूरों की समस्याएं अनसुनी रह जाती हैं। ESI अस्पतालों में भीड़ और अव्यवस्था के कारण इलाज के लिए पूरा दिन बर्बाद हो जाता है। कई बार इसी वजह से मजदूरों की एक दिन की मजदूरी भी कट जाती है।

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खोड़ा और आसपास की जिंदगी का संघर्ष

खोड़ा जैसे इलाकों में रहने वाले मजदूर बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन जीते हैं। किराए के छोटे कमरों में बिजली, पानी और गैस जैसी मूलभूत जरूरतों का खर्च भी भारी पड़ता है। कई परिवारों में पति-पत्नी दोनों काम करते हैं, फिर भी महीने के अंत में बचत नहीं होती। बच्चों की पढ़ाई, किराया, राशन और स्वास्थ्य खर्च मिलकर पूरी कमाई खत्म कर देते हैं। कुछ मजदूर ठेकेदारों के जरिए काम करते हैं, जहां स्थिति और भी कमजोर होती है क्योंकि उन्हें न तो पक्की पर्ची मिलती है और न ही पूरी मजदूरी।

प्रशासनिक जटिलताएं और सामाजिक असमानता

खोड़ा क्षेत्र प्रशासनिक रूप से गाजियाबाद में आता है, लेकिन यह नोएडा के पास स्थित है, जिससे लोगों को सरकारी कामों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। राशन कार्ड, वोटर आईडी, गैस कनेक्शन या अन्य दस्तावेजों के लिए पूरा दिन खराब हो जाता है। यहां की बड़ी आबादी दिहाड़ी मजदूरों और छोटे कर्मचारियों की है, जो पहले ही आर्थिक दबाव में रहते हैं। सरकारी सुविधाओं तक पहुंच की कठिनाई ने उनके जीवन को और जटिल बना दिया है। यह स्थिति शहरी विकास और मजदूरों की वास्तविक स्थिति के बीच गहरी खाई को दिखाती है।

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